Gurukuls v/s Conversion Mafia! – #ReasonBapujiInJail !?

Bhardoi is a sleepy hamlet located around 55 km from Agra (UP). Children form nearby villages attend the Play Group courses offered here. Quality English education along with Sanskars (Traditional Knowledge) are the defining factors of Gurukuls. The fusion provided is difficult for many to resist.

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Gurukul & Conversion Mafia – #ReasonBapujiInJail

This itself has been a big hindrance for Conversion Mafia (which according to sources has been pumping in in billions of dollars!! [Am sure You did not Know This]). Hence the mafia is a #ReasonBapujiInJail

Agra Gurukul Students Doing Anusthan!!

Bhardoi Gurukul is a minor sister concern of Sant Shri Asharamji Public School, Agra which started in 2004 and has seen more than Four Thousand Children grow up into able Adults who understand not only how to Earn a good living but even their responsibilities to Hindustan.

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आगरा गुरुकुल के विद्यार्थियों ने पूज्य बापूजी की रिहाई हेतु किया ४० दिवसीय ओमकार अनुष्ठान
साधुवाद है इन बाल गुरुभक्तों को |
अनुष्ठान में ४० दिन बच्चों इन नियमों का पालन किया
120 ओमकार माला
5 मिनट हरि ओम
का गुंजन
दो घंटे मौन
51 बड-दादा की
परिक्रमा
सूर्य को अर्घ्य,
तुलसी-पीपल को जल
पीपल की 9 परिक्रमा
5-7 तुलसी पत्ते, दों
बेल पत्र एवं दो काली मिर्च
का सेवन
टंक विद्या, तीन
भ्रामरी प्राणायम
तीन त्रिबंध प्राणायम
पाँच सूर्य-नमस्कार
बुद्धि शक्ति-मेधा शक्ति प्रयोग
१०८ श्वासों-श्वास की गिनती
दस मिनट त्राटक
दस मिनट ध्यान
दस मिनट सत्संग
भोजन एवं संध्या के समय मौन

Divya Leela of Sant Asharamji Bapu – Divali Special

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Divya Leela of Sant Asharamji Bapu – Divali Special

Divali Special – Watch Videos related to Divali here!!

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लक्ष्मी प्राप्ति का दुर्लभ मंत्र – ऋषि दर्शन

lakshmi prapti mantraLakshmi Prapti ka DURLABH mantra

 

Flood RELIEF (Sewa Karya)

 

Pisaach Bhojan….

 

Nation Awakening: (Sankirtan Yatra)

 

Divine Experience

 

दीपावली संदेश- मुसीबतें पैरों तले कुचलने की चीज हैं -पूज्य बापूजी

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ज्ञान-दीप  
दुःख, कष्ट, मुसीबतें पैरों तले कुचलने की चीज हैं। हिम्मत, साहस और हौसला बुलंद…. अमर जगमगाती ज्योत… आत्मा की स्मृति-प्रीति… पावन दीपावली आपके जीवन में प्रेम-प्रकाश लाती रहे!

जीवन है संग्राम। जख्म और कष्ट तो होंगे ही। विषमताओं के बीच श्रद्धा, विश्वास, समता, पुरुषार्थ और प्रेम का दीप जगमगाता रहे ! आप हो चिर प्रसन्नता की जगमगाती ज्योतिस्वरूप। इति शुभम्।

आप अपने हृदय-मंदिर में प्रभु-प्रेम की ज्योत निरंतर जलने दो ताकि अशुद्ध या अमंगलकारी कोई भी विचार या व्यक्ति तुम्हें परमार्थ के पथ से विचलित न कर सके।

शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से जो कुछ भी करें, उस परमात्मा के प्रसाद को उभारने के लिए करें तो फिर 365 दिनों में आनेवाली दिवाली एक ही दिन की दिवाली नहीं रहेगी वरन् आपकी-हमारी रोज दिवाली बनी रहेगी।

लक्ष्मी उसी के यहाँ रहती है, जिसके यहाँ उजाला होता है, जिसके पास सही समझ होती है। समझ सही होती है लक्ष्मी महालक्ष्मी हो जाती है और समझ गलत होती है तो वही धन मुसीबतें और चिंताएँ ले आता है। सेवा-साधना से आपकी धनलक्ष्मी सुखदायी, प्रभुप्रीतिदायी महालक्ष्मी हो।

हे प्रिय आत्मन् ! इस मंगलमय नूतन वर्ष के नवप्रभात में सत्य संकल्प करो कि मैं अपने सत्कर्मों से संपूर्ण भूमंडल पर भारतीय संस्कृति व गीता के ज्ञान का दीपक जगमगाता रहूँगा।

हे प्रकाशस्वरूप आत्मा ! हे सुखस्वरूप प्रभु के सनातन सपूत ! आपका जीवन हर परिस्थिति में सजगता, सावधानी, प्रसन्नता व प्रकाश से परिपूर्ण हो ! आत्मिक आनंद से जगमगाये जीवन !

तुम्हारे हृदय-मंदिर में वैदिक ज्ञान का शाश्वत प्रकाश जगमगाता रहे यही शुभकामना……. ॐ आनंद….
                                        ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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गुरुदेव दर्शन बिनु अंखियाॅं तरसे…

bapuji jaldi bahaar aao - sadhak ki pukarमेरे आत्म स्वरुप परम पूज्य सदगुरुदेव जी महाराज, हमारी दीपावली तो सदैव अप के साथ होती ही रहती है। आप नित्य निरंतर सुबह दोपहर शाम, चारों आयाम में हमारे हृदय में स्थित हैं। आप मेरे परमाराध्य ही हैं। आप ही मेरे श्रीराम हैं। आप ही मेरे शिव और श्री श्याम भी हैं। ऐसा कौन सा क्षण है जिसमे आप न हों। फिर भी हे आत्मधन आप इन चर्म चक्षुओं के सामने आकर इन्हें धन्य करें। ऐसी नम्र विनती आपसे हम सभी साधक करते हैं। आप पूर्ण दयालु और परम कृपालु हैं। भगवन अब आप भीतर के मिलन का सुख देने के साथ साथ बाह्य मिलन का निरंतर सुख भी प्रदान करें तो अच्छा हो।

गुरुदेव दर्शन बिनु अंखियाँ तरसे,
मिलन की आस में निसदिन बरसे।
हे प्रियवर अब आ भी जाओ,
ह्रदय-नयन को सुख बरसाओ।।

आपका भक्त
सुधांशु

सदा दिवाली संत की आठों पहर आनंद…….

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दीपावली पर विशेष: बाहर की नकली दीपावली  नहीं अन्दर की  वास्तविक दीपावली  मनावो  

सच्चे सद्गुरुदेव की जय हौ |
यह दीपावली  का अवसर है जिसे सांसारिक लोग अज्ञानता में बड़े ही धूम धाम से मनाते हैं. जो ज्ञान में नहीं हैं उनके लिए वर्ष में एक बार ही दिवाली आती है, किंतु जो ज्ञानी संतजन हैं उनके लिए प्रत्येक दिन, प्रतिक्षण दिवाली है। कहा गया है:

सदा दिवाली संत की आंठो प्रहार आनंद
निज स्वरुप मेँ मस्तहैँ, छोड जगत के फंद…..

 ब्रह्मज्ञानी महापुरुषो के हृदय में सदैव परमात्म आनंद का दरिया लहेराता  रहेता  है वो   अपने आपमें सदैव तृप्त रहते है उन महापुरुषोको दुनियाकी कोई भी ताकत  दुखी कर ही नहीं सकती 
यहाँ संसार की दिवाली में तेल या घी का दीपक, मोमबत्ती और बिजली द्वारा संचालित रंग बिरंगे बल्ब जलाकर इसी में आनंद मानते हैं. अंतर में मौजूद कोटिन यानि करोड़ों सूर्य चन्द्रमा के  दिव्य    प्रकाश  के अप्रतिम, अवर्णनीय सौंदर्य से बेखबर होने से हम असल दिवाली के अर्थ ही भूल गए. अपने असली देश के बारे संत कबीर जी लिखते हैं :
हम वासी उस देश के, जहाँ बारह मास विलास l
प्रेम झरै विकसे कवँल, तेज पुंज प्रकाश ll
हम वासी उस देश के, जहवां नहि मास बसंत l
नीझर झरै महा अमी, भीजत हैं सब संत ll
हम वासी उस देश के, जहाँ जाती बरन कछु नाहि l
शब्द मिलवा होए रहा, देह मिलवा नाहि ll
हम वासी उस देश के जहाँ पारब्रह्म का खेल ।
दीया जले अगम का बिनबाती बिन तेल ।।
अपने असली देश में सदा दिवाली है वोहीं परमानन्द है.
असली दीपक के सम्बन्ध में मीरा बाई कहती हैं:
सुरत निरत को दिवलो जोयो मनसाकी कर ली बाती।
अगम घाणि को तेल सिंचायो बाल रही दिनराती।।
संत रैदास जी कहते हैं
‘ प्रभुजी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती’

बाहरी पूजा करने वाले गणेश लक्ष्मी की मूर्ती और फोटो की अनजाने में पूजा करते हैं. आम जनमानस में यह धारणा है कि गणेश लक्ष्मी की पूजा से घर में सुख सम्पन्नता आयेगी. संतो की वाणी कहती है कि शरीर के निचले हिस्से में स्थित मूलाधार चक्र पर गणेश जी की छाया पड़ती है और पुराने युगों में जब योग के माध्यम से कुंडिलनी को जगाया जाता था तो गुदा द्वार में स्थित मूलाधार चक्र के जाग्रत होने पर रिद्धियाँ सिद्धियाँ प्राप्त हुआ करती थी. इनके माध्यम से सांसारिक भोग विलास कि वस्तुए प्राप्त की जाती हैं. संत मत की साधना में इन्हें निक्रष्ट माना गया क्यूंकि यह माया का ही विस्तार है और इससे जीव जड़ता में फसता है.

मेरे ईश्वर स्वरुप सच्चे सद्गुरुदेवका महा जयजयकार हौ |

आसाराम बापू और श्रध्दालु

जोधपुर कारागृह के बाहर भक्तों ने मनायी अनोखी दिवाली

प्रायः पर्व-त्यौहारों में जेल के बाहर की सड़कें सूनी व वीरान होती हैं लेकिन जब से पूज्य बापूजी का जोधपुर कारागृह में आगमन हुआ है, तब से यह तीर्थधाम बन गया है और पिछले 2 साल से कारागार के बाहर भक्तों का ताँता लगा रहता है।

गत वर्ष दीपावली के दिन पूज्य बापूजी के दर्शन के लिए देशभर से आये साधकों ने संध्या के समय कारागृह के मुख्य द्वार के पास दीपमालाएँ व रंगोली सजायी तथा दीवारों को दीपकों से जगमगा दिया। श्रध्दालुओं ने पूज्य बापूजी का एक बड़ा श्रीचित्र विराजमान कर आरती व पुष्प वर्षा की । अपने सद्गुरु के दर्शन के लिए व्याकुल भक्तों की गीली आँखें, पूजन के लिए हाथों में दीपक और भजन-आरती की ध्वनि… बड़ा ही अद्भुत नजारा था वहाँ का ! देर रात तक कीर्तन, जप व प्रार्थना के साथ साधकों ने निराली दिवाली मनायी ।

जोधपुर कारागृह,jodhpur central jail,pocsoदीपावली पर जगमगाये निःस्वार्थ सेवा के दीप

दीपावली में एक तरफ घरों में लोग मिठाई खाते-खिलाते हैं, नये कपड़े, बर्तन लाते हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे परिवार भी हैं जिन्हें सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती, तन ढँकने के लिए वस्त्र नहीं होते। करुणासिंधु पूज्य बापूजी हर वर्ष दिवाली के दिनों में ऐसे अभावग्रस्त आदिवासी इलाकों में जाकर गरीबों में अनाज, कपड़े, बर्तन, मिठाई, गर्म भोजन के डिब्बे, नकद रुपये एवं विभिन्न जीवनोपयोगी वस्तुओं के वितरण व विशाल भंडारों के आयोजन के साथ ही सत्संग देकर गरीबों की भी दिवाली हमेशा सुखमय करते रहे हैं ।

इससे धर्मांतरणवालों के मंसूबों पर पानी फिर गया और बापूजी की राष्ट्रहितकारी प्रवृत्तियों से जिन्हें नुकसान होता है ऐसी राष्ट्र-विखंडन चाहनेवाली ताकतों के साथ मिलकर उन्होंने एक सुनियोजित षड्यंत्र रच के पूज्य बापूजी पर बेबुनियाद, झूठे आरोप लगवाये और जेल भिजवा दिया । परंतु बापूजी के प्यारे साधक-शिष्यों ने अपने गुरुदेव के निर्देशानुसार पूरी तत्परता से अपने-अपने क्षेत्रों में पिछले साल की तरह इस बार भी दीपावली पर गरीबों की सेवा का अभियान चलाया।

गत वर्ष संत श्री आशारामजी आश्रम, रायता (महा.) एवं इंदौर में हजारों गरीबों में भंडारे के साथ गेहूँ, दाल, चावल, कपड़े, बर्तन, मिठाई, तेल, दीपक आदि का वितरण किया गया । जोधपुर आश्रम में सैकड़ों गरीब परिवारों में मिठाई के डिब्बे, कपड़े, चावल, आटा, कम्बल, चप्पल, नकद रुपये व सत्साहित्य वितरित किया गया । ग्वालियर आश्रम द्वारा 25 आदिवासी गाँवों में हजारों बच्चों को कपड़े, फुलझड़ी, मिठाई के डिब्बे, बिस्कुट, तुलसी टॉफी के पैकेट आदि दिये गये । देहरादून (उत्तराखंड) में गरीबों में मिठाई, कम्बल, बर्तन आदि बाँटे गये । सातारा (महा.) के अनाथ आश्रम के बच्चों में स्वेटर, मिठाई, नोटबुक एवं सत्साहित्य का वितरण किया गया । आमेट आश्रम द्वारा गरीबों में मिठाई, प्रसाद व अनाज वितरण तथा भंडारा किया गया ।

शाहजहाँपुर, फर्रूखाबाद, गाजियाबाद, बरेली, प्रयागराज, लखनऊ (उ.प्र.), अहमदाबाद, बड़ौदा, गोधरा, वापी, शेखपुर जि. पंचमहाल, मोलेथा (गुज.) अकोला, मालेगाँव (महा.), जालंधर (पंजाब), बिलासपुर, लैलूँगा (छ.ग.), शाजापुर, सीहोर, कपास्थल जि. धार, छिंदवाड़ा (म.प्र.), बाराँ (राज.), कठुआ (जम्मू-कश्मीर), खड़गपुर (प.बंगाल) आदि अनेक स्थानों पर गरीबों तथा आदिवासियों में वस्त्र, मिठाई, बर्तन, चप्पल, अनाज, नकद रुपये, दीया-बाती, तेल, तुलसी टॉफी के पैकेट आदि वस्तुएँ बाँटी गयीं ।

रायपुर के भवानीनगर (छ.ग.) में सैकड़ों गरीब परिवारों में जीवनोपयोगी सामग्रियों व सत्साहित्य का वितरण किया गया । ‘बाल व कन्या छात्र मंडल’ राजनांदगाँव (छ.ग.) के बच्चों ने वृध्दाश्रम में जाकर वृध्दों की सेवा करके तथा उन्हें कपड़े एवं अन्य जीवनोपयोगी वस्तुएँ देकर दिवाली मनायी । सिंदीगाँव जि. नवरंगपुर, जयपटना जि. कालाहांडी व संगमगुड़ा जि. कोरापुट (ओड़िशा) में चिकित्सकीय परामर्श के साथ होमियोपैथिक औषधियों का निःशुल्क वितरण किया गया तथा भंडारे का भी आयोजन किया गया ।

राजकोट, बोडेली, बड़ौदा, बारडोली, गोधरा, दाहोद (गुज.), छिंदवाड़ा, देवास, पंचेड़ (म.प्र.), जयपुर, बाराँ, अलवर (राज.), धमतरी, भँवरपुर (छ.ग.), डोम्बिवली (ठाणे-मुंबई), भुसावल, धुलिया, दोंडाईचा, बोईसर (महा.), भुवनेश्वर आदि में विशाल भंडारों एवं सामग्री वितरण का आयोजन किया गया । भँवरपुर (छ.ग.) में महिलाओं को लोहे की पेटियाँ (संदूकें) भी दी गयीं । अपने देश से दूर बैठे बोस्टन (यू.एस.ए.) के साधकों ने भी बापूजी के सिद्धांतों पर चलकर दीपावली महोत्सव मनाया ।

गरीबों की सेवा में लगा युवावर्ग

गत वर्ष दीपावली पर डांगमाची जि. धमतरी, बेलौदी, रायपुर (छ.ग.), मैनपुरी, मथुरा (उ.प्र.), श्रीगंगानगर (राज.), देहरादून (उत्तराखंड), अहमदाबाद, जमशेदपुर आदि स्थानों में ‘महिला उत्थान मंडल’ एवं ‘युवा सेवा संघ’ द्वारा जरूरतमंद लोगों को जीवनोपयोगी वस्तुओं का वितरण किया गया तथा भगवन्नाम कीर्तन करवा के पूज्यश्री का नित्य आध्यात्मिक दीपावली मनाने का शुभ संदेश दिया गया । जम्मू में कुष्ठाश्रम में फल आदि का वितरण किया गया। भावनगर (गुज.) में दवाखानों एवं कुष्ठरोगियों के अस्पताल में फल आदि का वितरण किया गया।

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पवित्रता

शास्त्र कहते हैं पवित्र व्यक्ति पर वज्र भी गिरे तो उसका बाल बाँका नहीं कर सकता। वज्रात् त्रायते इति पवित्रः। जो पवि अर्थात् वज्र से भी रक्षा करे उसका नाम है पवित्र। वज्र पवित्र व्यक्ति का स्पर्श नहीं कर सकता।

पवित्रता

हमारे धर्माचार की विधि है कि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठें तब जरूरत लगे तो लघुशंका, शौचादि करके अथवा ऐसे ही थोड़ी देर तक बिस्तर पर बैठकर ब्राह्ममुहूर्त का सदुपयोग करें, पवित्र चिंतन करें क्योंकि सोते समय सभी वासनाएँ शांत हो जाती है एवं जागने के बाद धीरे-धीरे उदित होती हैं। प्रभातकाल में नींद उड़ी है, सांसारिक वासनाओं का उदय अभी नहीं हुआ है – ऐसे समय में यदि अपने आत्मस्वरूप का, परम सत्य परमात्मा का चिंतन करोगे तो खूब-खूब लाभ होगा। जैसे विद्युत के प्रवाह के साथ जुड़ते ही बैटरी चार्ज (आवेशित) हो जाती है ऐसे ही प्रातःकाल में अपने चित्त एवं जीवन को पवित्र करने वाले आत्मा-परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जुड़ जाय तो हृदय में उसकी शक्ति का आविर्भाव हो जाता है। वह जीवनशक्ति फिर दिन भर के क्रिया-कलापों में पुष्टि देती रहेगी।

योगासन एवं यौगिक मुद्राएँ

तू गुलाब होकर महक….

प्रभात काल में यदि बहुत सुस्ती लगती हो, शरीर में अशुद्धि हो तो भले स्नान करके फिर आत्मचिंतन के लिए बैठो, परमात्म-स्मरण के लिए बैठो लेकिन नित्य कर्म के नाम पर दूसरी खटपट में नहीं पड़ना। सबसे पहले परमात्मा का ही चिंतन करना परमावश्यक है क्योंकि सबसे पवित्र वस्तु परमात्मा है। परमात्मा के चिंतन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। यदि ब्राह्ममुहूर्त में 5-10 मिनट के लिए आत्मा-परमात्मा का ठीक स्मरण हो जाय तो पूरे दिन के लिए एवं प्रतिदिन ऐसा करने पर पूरे जीवन के लिए काफी शक्ति मिल जाय।

अपना शरीर यदि मलीन लगता हो तो ऐसा ध्यान कर सकते हैं-

“मेरे मस्तक में भगवान शिव विराजमान हैं। उनकी जटा से गंगाजी की धवल धारा बह रही है और मेरे तन को पवित्र कर रही है। मूलाधार चक्र के नीचे शक्ति एवं ज्ञान का स्रोत निहित है। उसमें से शक्तिशाली धारा ऊपर की ओर बह रही है एवं मेरे ब्रह्मरंध्र तक के समग्र शरीर को पवित्र कर रही है। श्री सदगुरु के चरणारविंद ब्रह्मरंध्र में प्रगट हो रहे हैं, ज्ञान-प्रकाश फैला रहे हैं।”

ऐसा ध्यान न कर सको तो मन-ही-मन गंगा किनारे के पवित्र तीर्थों में चले जाओ। बद्री-केदार एवं गंगोत्री तक चले जाओ। उन पवित्र धामों में मन-ही-मन भावपूर्वक स्नान कर लो। पाँच-सात मिनट तक पावन तीर्थों में स्नान करने का चिंतन कर लोगे तो जीवन में पवित्रता आ जायेगी। घर-आँगन को स्वच्छ रखने के साथ-साथ इस प्रकार तन-मन को भी स्वस्थ, स्वच्छ एवं भावना के जल से पवित्र करने में जीवन के पाँच-सात मिनट प्रतिदिन लगा दोगे तो कभी हानि नहीं होगी। इसमें तो लाभ ही लाभ है।

सूर्योदय से पूर्व अवश्य उठ जाना चाहिए। सूर्य हमें प्रकाश देता है। प्रकाशदाता का आदर नहीं करेंगे तो ज्ञानादाता गुरुदेव का भी आदर नहीं कर सकेंगे। सूर्योदय से पहले उठकर पूजा करने का अर्थ है ज्ञानादाता का आदर करना। पूजा अर्थात् अपने जीवन में सत्कार की क्रिया। यह मानव का कर्त्तव्य है। भगवान भास्कर, ज्ञानदाता सदगुरुदेव एवं देवी-देवताओं का आदर तो करना ही चाहिए। इतना ही नहीं, अपने शरीर का भी आदर करना चाहिए। शरीर का आदर कैसे करें ? नीतिशास्त्र में एक श्लोक आता हैः

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं
बह्णशिनं निष्ठुरभाषिणं च।
सूर्योदये चास्मिते च शायिनं
विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्।।

“मैले वस्त्र पहनने वाले, दाँत गंदे रखने वाले, ज्यादा खाने वाले, निष्ठुर बोलने वाले, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाले स्वयं विष्णु भगवान हों तो उन्हें भी लक्ष्मी जी त्याग देती है।”

आदि नारायण स्वयं को गंदा देखें, मुँह में से दुर्गन्ध आने लगे, आलसी हो जायें तो लक्ष्मी जी उनसे तलाक ले लें। स्वच्छता एवं पवित्रता द्वारा लोगों की प्रीति प्राप्त करना, सुरुचि प्राप्त करना यह भी पूजा का, धर्म का एक अंग है। इसमें दूसरों की भी पूजा है एवं स्वयं की भी।

पवित्रता

साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज के कुछ लीला प्रसंग !!

ज्ञान, वैराग्य, योग-सामर्थ्य की प्रतिमूर्ति:

सर्दी का मौसम था। ब्रह्मवेत्ता संत साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज उनके अस्थायी निवास पर प्रवचन कर रहे थे। अचानक ही ठंड से थर-थर काँपती हुई एक बुढ़िया वहाँ पहुँची और हाथ जोड़के निवेदन करने लगीः “औ महाराज ! कुछ मेरा भी भला करो। मैं ठंड के मारे मर रही हूँ।”

साँईं जी अपने सेवक को बुलाकर कहा कि “कल जो रेशमी बिस्तर मिला था वह इस बुढ़िया को दे दो।” शिष्य ने सारा बिस्तर, जिसमें दरी, तकिया, गद्दा व रजाई थी, लाकर उस बुढ़िया को दे दिया और वह दुआएँ देती हुई चली गयी। जिस भक्त ने वह बिस्तर साँईं जी को दिया था, उससे रहा न गया। वह बोलाः “साँईं जी ! कम-से-कम एक दिन तो उस बिस्तर पर विश्राम करते तो मेरा मन प्रसन्न हो जाता।”

साँईं लीलाशाह जी बोलेः “जिस पल बिस्तर तुमने मुझे दिया, उस पल से यह तुम्हारा नहीं रहा और जो तुमने दान में दिया वह दान में ही तो गया! दुनिया में ʹतेरा-मेराʹ कुछ नहीं, जो जिसके नसीब में होगा वह उसे मिलेगा।” इस प्रकार भक्तों ने अद्वैत ज्ञान, वैराग्य एवं परदुःखकातरता का पाठ केवल पढ़ा ही नहीं, वह जीवन में किस प्रकार झलकना चाहिए यह प्रत्यक्ष देखा भी।

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दुश्मनों का बल निकाल रहा हूँ

एक बार साँईं जी रस्सी के बल सुलझा रहे थे। पूछने पर बोले कि “भारत के दुश्मनों का बल निकाल रहा हूँ।” उन दिनों भारत-चीन युद्ध चल रहा था। दूसरे दिन समाचार आया कि “युद्ध समाप्त हो गया और दुश्मनों का बल निकल गया।”

ब्रह्मनिष्ठ योगियों को भूत, वर्तमान एवं भविष्य काल – ये तीनों हाथ पर रखे आँवले की तरह प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उऩके मार्गदर्शन एवं आज्ञा में चलने वालों को उनकी त्रिकालदर्शी दृष्टि का लाभ मिलता है।

सोचें व जवाब दें-

इस प्रसंग द्वारा कौन-कौन से दिव्य गुण सीखने को मिलते हैं ?

ऐसा प्रसंग यदि आपके जीवन में आये तो किस तरह का व्यवहार करोगे ?

क्रियाकलापः गरीबों को मददरूप हो, ऐसा कोई आयोजन विद्यार्थी मिलकर कर सकते हैं।

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