मान्यताओं से ही सुख और दुःख

ये राग और द्वेष, भय और क्रोध हमारे चित्त को मलिन करते हैं। वास्तव में मान्यताओं से ही सुख और दुःख होता हैं|अनुकूलता आती है तो चित्त में राग की रेखा गहरी होती है, प्रतिकूलता आती है तो द्वेष या भय की रेखा गहरी होती है। चित्त में रेखाएँ पड़ जाती हैं तो चित्त क्षत-विक्षत हो जाता है। फिर वह शांत, स्वस्थ नहीं रहता। ….और

अशान्तस्य कुतः सुखम्।

अशान्त चित्त को सुख कहाँ ? संशयवाले को सुख कहाँ ? उद्विग्न को सुख कहाँ ?

सुख और दुःख

किसी जीवन्मुक्त महात्मा के चरणों में एक अदभुत स्वभाव वाला आदमी पहुँचा। बोलाः

“महाराज ! मैं चंबल की घाटी का हूँ। डाकू हूँ। अपनी शरण में रखोगे ?”

“हाँ, ठीक है।” महात्मा ने स्वीकृति दी।

“महाराज ! मैं दारू पीता हूँ।”

“कोई बात नहीं।”

“महाराज ! मैं जुआ खेलता हूँ।”

“कोई बात नहीं।”

“महाराज ! मैं दुराचार भी करता हूँ।”

“कोई बात नहीं।”

“महाराज ! मुझमें दुनियाँभर के दोष हैं।”

“कोई बात नहीं।”

“महाराज ! आप यह सब स्वीकार कर रहे हैं ?”

“भैया ! जब सृष्टिकर्त्ता तुझे अपनी सृष्टि से नहीं निकालता तो मैं तुझे अपनी दृष्टि से क्यों निकालूँ ?”

जो जीवन्मुक्त महापुरूष हैं वे ऐसा नहीं समझते कि मेरा आचरण सही है और दूसरे का आचरण गलत है। मेरा शरीर-तंत्र ठीक है, शुद्ध है, दूसरे का अशुद्ध है। ”मैं ठीक और दूसरा गलत…” ऐसा नहीं। दूसरों को भी मेरा अनुभव समझ में आ जाय, दुःखों और क्लेशों से छूट जाएँ ऐसी उन सर्वभूतहितेरताः महापुरूषों की चेष्टा होती है।

हम लोगों का हित इसी में है कि हम अपने आपको समझें। हम अपने आपको नहीं समझेंगे तो कैसी भी परिस्थिति होगी, चित्त का राग और द्वेष जाएगा नहीं।

वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है अथवा हमारी मान्यताओं के अनुसार जो सुख है वह वास्तविक में राग का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुःख होता है वह वास्तविक में बाहर दुःख नहीं है। हमारी मान्यताएँ हमको दुःख देती हैं।

को काहू को नहीं सुख दुःख करी दाता।

निज कृत कर्म हि भोगत भ्राता।।

हम लोग अपने ही विचार, अपनी ही मान्यताओं की गठरियाँ, अपने ही संस्कार पैदा करके दुःख की रेखाएँ खींचकर अपने को जंजीर में बाँधते हैं और सुख की रेखाएँ खींचकर अपने आप आसक्त होकर बँध मरते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने संकल्प किया कि प्रभुजी युगल सरकार जिस रास्ते से यात्रा को गये उसी रास्ते में मैं यात्रा को जाऊँ। यात्रा करते-करते दण्डकारण्य आया। रास्ता सँकरा था। सँकरी पगदण्डी के किनारे झाड़ी में कोई भोगी आदमी वेश्या के साथ विलास कर रहा था। तुलसीदासजी रास्ते में आधे तक आ चुके थे। उन्होंने सोचा कि अगर वापस लौटूँगा तो भी उन लोगों को सन्देह होगा कि बाबाजी ने देख लिया। आगे जाऊँगा तो भी शरमिन्दे होंगे।

भगवान नाम जप के 20 नियम !
वैशाख मास माहात्म्य

उन संत-प्रवर ने अन्धा होने का अभिनय किया। हाथ में लाठी थी। आँखें बन्द कर लीं। लाठी आगे ठोकते-ठोकते चलते हुए पुकारने लगेः

“ऐ भाई ! भगवान के नाम पर कोई रास्ता दिखा दो….।”

भोगी आदमी ने सोचा कि चलो, अच्छा हुआ। यह बाबा आ तो रहा था लेकिन अन्धा है। वह बोलाः

“महाराज ! सीधे सीधे चले जाओ चुपचाप…. जल्दी से। यही रास्ता है। निकल जाओ जल्दी।”

महाराज लकड़ी टेकते-टेकते घाटी की झाड़ी से बाहर निकले। आँखें खोली तो सामने सियाराम मुस्कुराते हुए मिले।

संतों का नित्य अवतार
સંત શ્રી આસારામ બાપુજી દ્વારા જનહિત ની ગંગા

“प्रभु ! आप यहाँ कैसे ?”

“तुलसीदास ! सज्जन में भगवान देखना आसान है लेकिन सबमें भगवान देखने वाले, दुर्जन में भी भगवान देखने वाले तुम्हारे जैसे संत-प्रवर दुर्लभ हैं। ऐसे संतों को देखने के लिए मैं आ जाता हूँ।

यह जरूरी नहीं कि हम जैसा चाहते हैं ऐसा जगत बन जाएगा। यह सम्भव नहीं है। हम चाहेंगे ऐसी पत्नी होगी यह सम्भव नहीं है। पति ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। शिष्य ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। हम जैसा चाहें ऐसे गुरू बनें यह सम्भव नहीं है। यह सम्भव नहीं है ऐसा समझते हुए भी जितना भी उनका कल्याण हो सके ऐसी उनको यात्रा कराना यह अपने हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है। हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है।